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Disha Students' Organization/ दिशा छात्र संगठन
Flee Not, Change The World !
साम्राज्यवाद का नाश हो!![]()
ट्रम्प द्वारा वेनेजुएला पर किये गये साम्राज्यवादी हमले के ख़िलाफ़
विरोध प्रदर्शन![]()
4 जनवरी | 2 बजे
जन्तर-मन्तर, दिल्ली![]()
सम्पर्क : 9852838689, 9971672425
दिशा छात्र संगठन
जाति-धर्म में नहीं बटेंगे!
मिल-जुल कर संघर्ष करेंगे!!
जाति उन्मूलन का रास्ता, इंक़लाब का रास्ता!
ब्राह्मणवाद का नाश हो! जातिवाद का नाश हो!!
दिशा छात्र संगठन, नौजवान भारत सभा और स्त्री मुक्ति लीग के संयुक्त तत्वाधान में प्रथम महिला शिक्षकायें सावित्रीबाई फुले और फ़ातिमा शेख़ के जन्मदिवस (3 जनवरी और 9 जनवरी) के अवसर पर सावित्री-फ़ातिमा स्मृति सप्ताह मनाया जा रहा है। सप्ताह के पहले दिन आज सावित्रीबाई फुले के 195वें जन्मदिवस पर इलाहाबाद के एलनगंज स्थित अशफाक़-बिस्मिल पार्क में 'सावित्रीबाई फुले की क्रान्तिकारी विरासत और जाति उन्मूलन का रास्ता विषय पर बातचीत एवं जाति तोड़क भोज का आयोजन किया गया।
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को सतारा ज़िले के नायगांव में हुआ था। सावित्रीबाई फुले ने अपना पूरा जीवन समाज में प्रचलित रुढ़ियों, पाखण्डों की धज्जियाँ उड़ाते हुए तर्क और विज्ञान के प्रचार-प्रसार में खपा दिया। सावित्री-फ़ातिमा ने सदियों से चली आ रही असमानता, जातिगत भेदभाव, स्त्रियों की ग़ुलामी को आँख मूँदकर स्वीकार कर लेने के बजाय इसके ख़िलाफ़ संघर्ष का रास्ता चुना। फुले ने अपने लेखन तथा संघर्ष से एक ऐसी मशाल जलायी जो आज भी हमारी राहों को रोशन कर रही है। सावित्रीबाई फुले फ़ातिमा शेख़ एक ऐसे समय में पैदा हुयीं जब हमारा देश उपनिवेशवादी और सामन्ती शोषण के जुए तले पिस रहा था। उस समय दलित व स्त्री उत्पीड़न चरमोत्कर्ष पर था। ऐसे दौर में फुले का पूरा जीवन जाति-उन्मूलन और स्त्रियों की शिक्षा व मुक्ति के लिए समर्पित रहा। आज हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जब प्रतिक्रियावादी ताकतें पूरे समाज में हावी हैं तथा तर्क और विज्ञान की हत्या करके पाखण्ड और कूपमण्डूकताओं को स्थापित कर रही हैं। स्त्रियों, अल्पसंख्यकों और दलितों के उत्पीड़न की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। सावित्री-फ़ातिमा ने ना केवल स्त्रियों की शिक्षा के लिए संघर्ष किया बल्कि जातिवाद व अस्मितावाद के ख़िलाफ़ संघर्ष से लेकर विधवाओं के बाल काटने से रोकने के लिए नाइयों की हड़ताल करने, बाल विवाह आदि को रोकने के लिए जीवनपर्यंत लड़ती रहीं बल्कि इन संघर्षों में आम जनता की पहलक़दमी को भी प्रोत्साहित की। विधवा विवाह का समर्थन, बाल-विवाह का निषेध, विधवाओं के बच्चों के पालन-पोषण जैसे अनेक कदमों से ज्योतिबा और सावित्रीबाई के स्त्री समानता और स्त्री स्वतन्त्रता के लिए लड़ते रहे। 1842 में सावित्रीबाई ने महिला मण्डल बनाया जिसके तहत बाल विवाह में महिलाओं पर होने वाले ज़ुल्म से लेकर विधवा महिलाओं के मुण्डन के ख़िलाफ़ नाइयों तक को संगठित किया। उन्नीसवीं सदी के 7वें दशक में महाराष्ट्र में पड़े अकाल में सावित्रीबाई फुले ने सरकार पर दबाव डालकर अकाल पीड़ितों के लिए रिलीफ़ कैम्प बनाने पर मजबूर किया। उन्नीसवीं सदी के आखिरी दशक में फैली प्लेग महामारी के दौरान मरीज़ों की सेवा करते समय सावित्रीबाई फुले खुद ही इस महामारी की चपेट में आ गयी और अन्ततः 10 मार्च 1897 को इनकी मृत्यु हो गयी।
आज आज़ादी के सात दशक के बाद भी जाति के आधार पर एक बड़ी आबादी आर्थिक रूप से भयंकर लूट की शिकार है। समाज में हर जगह हर पल जातिगत भेदभाव, अन्तर्जातीय प्रेम पर हत्याएं, ये हमारे आज के समय की एक कड़वी सच्चाई है। आंकड़ो के मुताबिक दलित आबादी के ख़िलाफ़ उत्पीड़न के मामले काफ़ी बढ़ गए हैं। भारत में हर 15 मिनट में दलितों के साथ आपराधिक घटनाएं दर्ज होती है। ये वो मामले है जो पुलिस थाने तक पहुँच पाती है, इसके अलावा इससे कई गुना अधिक मामलों में पीड़ित पुलिस थाने भी नहीं जाता क्योंकि वहाँ भी उसे बेज़्ज़ती का सामना करना पड़ता है। ये आंकड़े देश में दलितों की समाज में स्थिति और उनकी दशा की कहानी बयां करने के लिए काफी है। फ़ासीवादी भाजपा के सत्ता में आने के बाद दलित विरोधी हिंसा के मामलों में बहुत तेजी से वृद्धि हुई है। आज हर इंसाफपसन्द व्यक्ति इस जाति व्यवस्था को ख़त्म होते देखना चाहता है और हर शासक वर्ग इस जाति व्यवस्था को बनाये रखने के पूरे प्रयास करता है। भारत में बाहर से जितने भी शासक आये, उन्होंने इस नायाब हथियार का जनता को बांटने में भरपूर इस्तेमाल किया। चाहे वो मध्यकालीन मुगल शासक हों या फिर आधुनिक ब्रिटिश साम्राज्यवादी, या फिर आज के हमारे तथाकथित लोकतांत्रिक शासक, सबने अलग-अलग तरीके से जाति व्यवस्था को मजबूत ही किया है।
जाति उन्मूलन की पूरी परियोजना इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनायी जा सकती है। जाति आधारित संगठन बनाकर, बहुजन एकता का खोखला नारा देकर या फिर संविधान के रास्ते कुछ कानून बनाकर जाति का अंत नहीं किया जा सकता। हर जाति में आज एक छोटी सी आबादी ऐसी है जो संसाधनों पर कब्जा किये हुए है। इसलिए सभी जातियों के गरीबों को एकजुट होकर लड़ने की जरूरत है। निश्चित रूप से ये रास्ता आसान नहीं है। अगर आसान होता तो अब तक सभी जातियों के गरीब अपने आप ही एकजुट हो जाते और तब जाति व्यवस्था खत्म हो जाती। हजारों सालों से भारत में जाति व्यवस्था है और ऐसे में थोड़े से प्रचार से गरीब साथ नहीं आ जायेंगे पर ये भी सच है कि इसके अलावा ओर कोई रास्ता नहीं है।गरीब आबादी में जो जातिगत संस्कार और जातिगत पूर्वाग्रह व्याप्त हैं, उनके खिलाफ भी क्रांतिकारी आन्दोलन को निर्मम लड़ाई लड़नी पड़ेगी लेकिन ऐसी कोई भी लडा़ई संघर्षों के दौरान ही खड़ी की जा सकती है। उन मुद्दों पर हमें एकसाथ संघर्ष के लिए उतरना ही पड़ेगा जो हर जाति के गरीब के मुद्दे हैं। जब हर जाति के गरीब साझा संघर्षों में साथ उतरेंगे, उसी प्रक्रिया में जातिगत पूर्वाग्रह और जातिगत भेदभाव के संस्कारों का वर्चस्ववाद तोड़ने की शुरूआत की जा सकती है।
जुझारु जनपक्षधर रंगकर्मी और नाटककार सफ़दर हाशमी के शहादत दिवस (2 जनवरी) पर क्रान्तिकारी सलाम !![]()
"भारतीयता हमारे रंगमंच में तभी आयेगी, जब रंगकर्मी वैज्ञानिक दृष्टिकोण लेकर, ईमानदारी और लगन के साथ मौजूदा भारतीय निज़ाम का अध्ययन, विश्लेषण शुरू करेंगे। एक ग़ैरवैज्ञानिक समझ को कितने ही पारम्परिक अन्दाज से क्यूँ न पेश करें, वह समझ ग़लत ही रहेगी।"![]()
~ सफ़दर हाशमी
बढ़ते जन-आक्रोश के दवाब में सुप्रीमकोर्ट को अपराधी कुलदीप सिंह सेंगर की ज़मानत पर रोक लगानी पड़ी!![]()
साथियो, सुप्रीम कोर्ट ने 29 दिसंबर 2025 को उन्नाव रेप केस में पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की जमानत पर रोक (Stay) लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश को स्थगित कर दिया है, जिसमें 23 दिसंबर 2025 को सेंगर की उम्रकैद की सजा निलम्बित कर उसे जमानत दी गई थी। गोदी मीडिया के भोंपू बता रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने यह कदम सीबीआई (CBI) द्वारा हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए उठाया है लेकिन इसकी ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह फैसला देना जनता के विरोध का नतीजा है। क्योंकि हाईकोर्ट द्वारा कुलदीप सिंह सेंगर जैसे अपराधी की सज़ा माफ़ किये जाने के फ़ैसले से देशभर में आक्रोश का माहौल था। इस फ़ैसले ने एक बार फिर यह दिखा दिया था कि भाजपा ऐसे आपराधिक तत्वों को बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है और सिर्फ़ यही नहीं उच्च न्यायालय के इस फ़ैसले ने न्याय व्यवस्था के पूरे चरित्र को भी बेनक़ाब कर दिया था। पिछले 11 सालों में तमाम जनवादी संस्थाओं में भाजपा-आरएसएस ने अपनी घुसपैठ करके उन्हें अन्दर से खोखला करने का काम किया है। कहने के लिए आज न्याय व्यवस्था मौजूद है लेकिन ऐसे तमाम उदाहरण हैं जो बताते हैं कि असल में यह अन्याय की व्यवस्था बन कर रह गयी है। सरकार से सवाल करने वालों और सच बोलने वालों को जेल भेजना आज एक आम बात बन चुकी है वहीं दूसरी तरफ़ हत्यारों, बलात्कारियों को बेल मिलना भी कोई चौकाने वाली बात नहीं रह गयी है।![]()
आपराधिक मानसिकता के लोगों को भाजपा राज में जहाँ एक तरफ़ बढ़ावा मिला है वहीं दूसरी तरफ़ पुलिस से लेकर कोर्ट-कचहरी तक का स्त्री-विरोधी रवैया हमारे सामने है।
बढ़ती स्त्री-विरोधी घटना के ख़िलाफ़ आज जहाँ सड़कों पर उतरकर विरोध दर्ज करने की ज़रूरत है वहीं दूसरी तरफ़ हमें इन घटनाओं के पैदा होने की ज़मीन को भी तलाशना होगा तभी सही मायने में स्त्री-विरोधी घटनाओं के ख़िलाफ़ संघर्ष को सही दिशा में संगठित कर पायेंगे।![]()
• दिशा छात्र संगठन ![]()
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